ये कहानी धोखे पर आधारित है, इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को सकारात्मकता की ओर अग्रसर करना है. धोखे या दगे के प्रभाव की समझना है. वर्तमान में लोग एक दुसरे की तांग खीचने में लगे रहते है उनके लिए ये कहानी एक विशेष सन्देश रहेंगी. आइये हम कहानी की और बढ़ते है
हिन्दी कहानी दगा किसी का संगा नही !
बहुत समय पहले की बात है.
एक महात्मा थे. उनका नाम था परमानन्द. महात्मा की साधना अद्भुत थी. वे एक ही सत्य,
एक ही ईश्वर व धर्म को मानते थे.
इसके आलावा वर्ष में एक बार ही नगर में आना
एक ही घर की भिक्षा लेना. और सबसे महत्वपूर्ण बात थी. केवल एक ही उपदेश लोगों को
देना.
महात्मा जब नगर में आते थे. तो लोगों का जम घट
हो जाते थे. लोग उनका भव्य स्वागत करते थे. फिर महत्मा किसी एक घर जाते थे. वे जिस
घर पर जाते थे. लोग अपना भाग्योदय मानते थे.
फिर जो मिला वही सही. उसे लेकर नगर में आते
थे. और घूम घूम कर अपना एक ही उपदेश देते
थे. किसी से धोखा मत करो. और आगे यह पक्तियाँ दोहराते थे.
दगा किसी का सगा नही
न किया तो करके देखों !!
लोग हर वर्ष यही
ज्ञान सुनते थे. उनसे किसी ने कभी तर्क वितर्क न किया था. बारह वर्ष से महात्मा
यही उपदेश देते आ रहे थे.
महात्मा जिस नगर में उपदेश देते थे. उसी नगर में
एक करोड़पति सेठ मोती रहता था. सेठ मोती
पास ही के बड़े नगर में धंधा करता था. सेठ की पत्नी थी –माला. उनके कोई संतान न थी.
सेठ संत स्वाभाव का था. और उसकी पत्नी माला घमंडी व तामसी स्वाभाव की थी. वह कभी
संत-महात्मा का आदर नही करती थी.
सेठ की पत्नी माला, महात्मा परमानन्द व
उनके उपदेशो से पसंद नही करती थी, और उपदेशो से नफरत करती थी. वह सोचती थी. ये महात्मा
नही कोई दुष्ट है. इन्हें कोई और ज्ञान न है इसलिए एक ही उपदेश रटा-रटाया
प्रतिवर्ष देते हैं.
किसी को धोखा मत देना. फिर सेठ की पत्नी
माला निश्चय करती है की किसी से धोखा न करने वाली शिक्षा देने वाले से ही धोखा
करुँगी.
माला, महात्मा परमानन्द को मरने का
षड्यंत्र रचती है. योजना अनुसार उसने आगामी वर्ष उन्हें मारने का निर्णय ले ही
लिया.
जब महत्मा का एक वर्ष पूरा हुआ. वे नगर की ओर
प्रस्तान कर रहे थे. माला ने उनका दिखावटी भव्य आदर-सत्कार कर अपने भवन पधारने का
अनुरोध किया. महात्मा परमानन्द ने उसका अनुरोध स्वीकार के लिया. यह सुन माला फूली
न समाई.
महात्मा ने घर पहुँते ही उन्हें उपदेश सुनाया.
किसी से धोखा मत करना. माला को उपदेश की चिंता न थी. वह गोबर गणेश बन रही थी.
उन्हें तो महात्मा को धोखे से मारना था.
महात्मा आसन पर विराजमान थे. माला घर के भीतर
गयी. और चार लड्डू बनाए. उनमे से दो लड्डू में विष मिलाया. और दो विषमुक्त लड्डू
रखे. ताकि महात्मा उन्हें स्वंय को खाने का कहे तो विषमुक्त लड्डू ही खाएंगी.
माला थाल ने चारो लड्डू व मोती–माणक लायी.
महात्मा ने कहा पुत्री, मोती-माणक मेरे किस काम के हैं. तुम चाहों तो मैं तुम्हे
दे दू.
माला ने कहा –नही बाबा, आप जो चाहो रखलो.
महात्मा ने चारों लड्डू को कमंडल में डाल दिये. फिर माला से कहा-पुत्री याद रखना
किसी से धोखा मत करना. फिर महात्मा यही उपदेश नगरवासियों को देकर चल पड़े.
माला ने सोचा –धोखा की शिक्षा देने वाला धोखे
से मर जायेंगा. लेकिन उसी रात भयंकर तूफान के साथ वर्षा हुई. माला का पति सेठ मोती
तूफान में फंस गया.
सेठ मोती किसी तरह घर आ रहा था. परन्तु
पानी में चलते चलते रास्ते में ही सवेरा हो गया. सेठ थक गया. रास्ते में उसी
महात्मा परमानन्द का आश्रम था. थका हारा सेठ महात्मा के आश्रम में गया. वहां
महात्मा परमानन्द ने उसकी सहायता की ! सेठ को विश्राम करवाया.
सेठ मोती ने महात्मा से अनुरोध किया. महात्मा
जी मैं थकान व भूख से पीड़ित हूँ. आपने विश्राम करवाकर , मेरी थकान तो हर ली,
परन्तु भूख का क्या होंगा. मेरे से आगे चला नही जा रहा.
महात्मा ने कहाँ –ठहरो बेटे कल मैने नगर से
चार लड्डू लाये. अपन दोनों मिलकर खा लेते हैं. उन्होंने चारों लड्डू मेरे दो लड्डू
मोती सेठ को खाने के लिए दिये.
लेकिन प्रकृति की लीला निराली है. विष वाले
दोनों लड्डू ही सेठ को मिल गये. और महात्मा के पास बिना विष के रहा गए.
सेठ ने धीरे धीरे आधा लड्डू खाया. फिर उसका
सर चक्करा गया ! और वही ढेर हो गया. महात्मा यह देख भौंचके रह गये. उन्होंने अपने
शिष्य के साथ संदेशा भेज कर, लड्डू देने वाली माला को बुलवाया .
सेठ की पत्नी आश्रम में आयी. और देखा की
लड्डू खाने वाला उसका पति ही हैं, फिर जोर जोर से रोने लगी, मैंने लड्डू महात्माजी
को मारने के लिए बनाये थे. ये क्या हुआ –हाय मेरे स्वामी?
महात्मा ने कहा –पुत्री मैंने कहा था धोखा,
यानी दगा किसी का सगा नही ! न किया तो करके देखों !!
तुमने मेरे साथ
किया, परन्तु यह किसी का नही संगी, इसने तेरा ही घर डूबों दिया . माला महात्मा के
पैर पकड़ कर रोने लगी.
महात्मा ने कहाँ –अब पछताए, होत क्या,
जब चिड़िया चुग गई खेत
अब समय निकल गया, तेरा पति
स्वर्ग सिधार गया. अब इनका क्रिया कर्म करो.
माला ने महात्मा को मारने का षड्यंत्र, व उसी के
जाल में उसका पति मारा गया. यह समाचार नगर में आग की तरह फ़ैल गया.
सभी नगरवासी इकट्टे हो गये. महात्मा ने लोगो को
कहा –इसने मेरे साथ धोखा किया. परन्तु धोखे ने उसी के पति को खा लिया. आप सभी नगर
वासी इसका अंतिम संस्कार करो.
सब नगरवासी अंतिम संस्कार करने शमशान गये.
माला घर से निकल महात्मा के पास गयी, वहा जाकर क्षमा मांगी. और उपाय मांगा.
महात्मा ने उपाय बताया, की हे पुत्री अपने
धन-दौलत से रोगी, गरीब व असहाय पशु, पक्षी, मनुष्य, की सेवा करो. जिससे तेरे पति
की आत्मा को शांति मिलेंगी.
माला ने घर पहुँच सारी सम्पति दोनों हाथो से
लुटा दी. उधर शमशान में चिता पर उसका पति मृत लेता हुआ था. लोगों ने चिता को अग्नि
दी. आग की गर्मी पाकर सेठ मोती चिता पर बैठ गये. और अचानक दौड़ कर आग से निकल गये.
यह देख कर लोग भाग गये. भुत-आया, भुत- आया !
सेठ मोती बिल्कुल नही जला था. उन्हें जो विष चढ़ा था, वह भी गर्मी पाकर नष्ट हो
गया.
सेठ घर गया तो माला भी डर गयी. तो सेठ सीधा
महात्मा के आश्रम में पहुंचा. महात्मा को सबकुछ पता लग गया. उन्होंने सेठ से कहा
तुम्हारा पुर्नजन्म हुआ है. यानी धर्म से, पूण्य से, सेवा से, तुम्हारा शारीर
प्राणवान हो गया है.
अब माला भी वहां आ गयी. महात्मा ने दोने से
कहां अब किसी से धोखा मत करना. दोनों ने प्रतिज्ञा की हम कभी धोखा नही करेंगे. इस
घटना के नौ महा के बाद माला के गर्भ से एक बालक का जन्म हुआ. फिर उनका जीवन ख़ुशी
में बदल गया. सेठ को बहुत अच्छा धंधा मिला. पुन: सुख सम्पति पाई.

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